आया रे आया रे आया सावन झूमे रे झूमे रे झूमे चितवन गाया रे गाया रे गाया सावन नाचे रे नाचे रे नाचे चितवन आया रे आया रे आया सावन आया रे आया रे आया सावन सावन की रिमझिम–रिमझिम झड़ियाँ चमकती गरजती दीवानी बिजलियाँ छम–छम करतीं नाचतीं बूँदे होकर मतवाली करतीं अटखेलियाँ और अल्हड़ बादलों की मस्तियाँ दिल को चुरातीं बनकर लूभावन (दिल में चंचल हलचल करती उनकी यादों की अटखेलियाँ) आया रे आया रे आया सावन झूमे रे झूमे रे झूमे चितवन गाया रे गाया रे गाया सावन नाचे रे नाचे रे नाचे चितवन आया रे आया रे आया सावन घाटी, खेती, चोटी, पहाड़ियाँ हरियर–हरियर ओढ़े हैं चुनरियाँ बहती जाती हैं कल–कल नदियाँ बजतीं हो जैसी घुंघरू–पैजनियाँ और झरने जैसे मोती की लड़ियाँ हर लेती हैं मन को बनकर मनभावन आया रे आया रे आया सावन झूमे रे झूमे रे झूमे चितवन गाया रे गाया रे गाया सावन नाचे रे नाचे रे नाचे चितवन आया रे आया रे आया सावन हरी–हरी कांच की चूड़ियाँ पहनकर खनकाती कोई सजनिया सावन के झूले झुलातीं सहेलियाँ गुनगुना रहीं राग मल्हार–ददरिया और सावन का ...
संदेश
चंदा रे तेरे दर्शन को (करवा चौथ)
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चंदा रे तेरे दर्शन को, आतुर उसकी नयना है, ताक रही है आसमान को, जल अर्पण जो करना है। कहती है शशि को निहार लूं, फिर आपको निहारूंगी, सातों जन्मों के बंधन में, इक सुत और पिरोऊंगी। प्रेम प्रिया की इस डोरी में, क्या खूब बंधा हुआ हूं, तेरा रस्ता तकने छत पर मैं, साँझ से बैठा हुआ हूं। जब तब मत कर ओ रजनीकर, अब इतना देर न करना, चंद्रलोक से मेरे घर तक, तू जल्दी जल्दी चल ना। चंदा रे तेरे दर्शन को, आतुर उसकी नयना है, ताक रही है आसमान को, जल अर्पण जो करना है। कभी बादलों में गुम जाता, कभी फलक पे रुकता है। जितनी तृष्णा बढ़ती जाती, उतना ही तू छुपता है। रात भी गहरी हो गई है, निशिथ पहर आन चला है। तू क्यों छुपा हुआ है अब तक, चांद! क्या तू मनचला है? लुका छिपी बहुत हो गया रे, कितना और सताएगा, आंख मिचौली करते–करते, सारी रात पहाएगा! जल्दी आना, तुझको किसका, और प्रतीक्षा करना है? मेरे इस चांद संग तुझको, मुझे भी अवलोकना है। चंदा रे तेरे दर्शन को, आतुर उसकी नयना है, ताक रही है आसमान को, जल अर्पण जो करना है। ✍🏻 दाता राम नायक DR
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सादगी के इस श्रृंगार में, खो जाने को दिल करता है। चंद्रमा की इस चांदनी को, पा जाने को दिल करता है। तुम्हे देखकर ही मिलती है, बेशुमार सुकून इस दिल को, तुम्हारे गोद में सर रखकर, सो जाने को दिल करता है। सादगी के इस श्रृंगार में.... चंद्रमा की इस चांदनी में.... तेरी इन काली आंखों में, इक गहरा सागर बहता है, अपने अल्हड़ सी लहरों से, मुझे रोज खींचा करता है। कितना भी रोकूं, मैं खुद को, कितना ही टोकूं मैं खुद को, लहरों के अटखेलियों संग, डुब जाने को दिल करता है। सादगी के इस श्रृंगार में.... चंद्रमा की इस चांदनी में.... देखकर किसी को तुम ऐसे, मीठा मुस्कुराया न करना, अपने होठों के हलचल से, गैरों को यूं फना न करना। एक मुस्कान ही काफी है, लूटने के लिये दुनिया को, किसी और से पहले खुद ही, लुट जाने को दिल करता है। सादगी के इस श्रृंगार में.... चंद्रमा की इस चांदनी में.... तुम्हारे रेशमी जुल्फों का, हवा संग बाते कर जाना, रुखसारों को छू कर इनका, कमर से नीचे उतर आना। जुड़े में बांध कर रखो इन्हें, कोई आशिक फंस न जाये, लंबे केशो के पाशो में, खो जाने को दिल करता है। सादगी के इस श्रृंगार में.... चंद्रमा की इस ...
नौ दिन बर पहुना
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नौ दिन के तोर रूप नौ ठन, हावे भारी सुग्घर। हावे भारी सुग्घर दाई, हावे भारी सुग्घर। नौ दिन बर पहुना बन तैं हर, आए मोर टुठा घर, आए मोर टुठा घर दाई, आए मोर टुठा घर। जिसने बन पाही तिसने वो, करिहूँ सेवा–सुरसा। सरधा के दू फूल चढ़ाहूँ, नवराता के मउका। जलाहुँ दियना चारों कोती, जगर–बगर, जगर–बगर, जगर–बगर, जगर–बगर दाई, जगर–बगर, जगर–बगर। नौ दिन बर पहुना.... चढ़गे मांदर मं चाप अऊ, झांझ मंजिरा बाजे। तोर जसगीत के चौका मं, भगत–उपासिन नाचे। नाचत–गावत रात पहा गे, नई भरिस मन भर–भर, नई भरिस मन भर–भर दाई, नई भरिस मन भर–भर। नौ दिन बर पहुना.... लाली लाली लुगरा पहनिन, करधन पैंजन बाँधिन। लाली चुनरी मं नौ कइना, अंगना मोर उतरिन। मोर भाग हावे महतारी, सबले अब्बड़ उज्जर, सबले अब्बड़ उज्जर दाई, सबले अब्बड़ उज्जर। नौ दिन बर पहुना.... कारी–कारी रथिया मं तैं, चंदा बनके आबे। जस सुरुज सही बिगबिग–बिगबिग, डाहर रोज दिखाबे। दया–मया, अशीष के झक्खर, बरसाबे ओ झर–झर, बरसाबे वो झर–झर दाई, बरसाबे वो झर–झर। नौ दिन बर पहुना.... रचनाकार:– दाता राम नायक DR सुर्री, र...
मेरे मृत्युंजय
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कर दिया है मैने अपना सारा जीवन तेरे चरणों में अर्पण मुझे किसका लागे डर? अब किसका लागे भय? मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... मेरा रास्ता भी तू है मेरा मंजिल भी तू है मेरे सारे अड़चनों का समाधान भी तू है तेरे रहते मुझे काहे का संशय मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... तेरे सिवा बाबा कौन है मेरा यहां? तेरे बिना इस जग में मैं जाऊं कहां? तेरा दर ही है मेरा निलय मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... तू ही पालनहार तू ही तारणहार है तू ही रचता है दुनिया तू ही करता संहार है तू ही प्रारंभ तू ही प्रलय मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... जिसका साथ हो ले तू, वह निर्बल नहीं रहता जिंदगी के राहों में निष्फल नहीं रहता होती नहीं कभी उसकी पराजय मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... साक्षात् काल का, एक तू ही तो काल है, बाबा त्रिकाल दर्शी कालों का महाकाल है यम को भी देता तू ही अभय मेरे मृत्युंजय मेरे मृत्युंजय.... –: दाता राम नायक "DR" 14/07/2025
एसो के चुनई कका
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संगवारी हो, ऐसों हमन सब्बो अपन-अपन के ठऊर-ठिकाना के आधार मं गाँव सरकार अऊ नगर सरकार चुनेन। सब्बो जानत हव चुनई के बखत मं कइसे माहौल रथे; चुनाव आचार संहिता लगय के पहिली अऊ चुनाव परिणाम के पाछु के माहौल ल संक्षिप्त लईन मं लिखे के परयास करे हव, पढ़ के कइसे लागिस कमेन्ट करके जरुर बताहू:- ***चुनई आचार संहिता के पहिली*** एसो के चुनई कका, निपटहि कइसे जान । कुकुर घलों पूछे नही, अहु पाही गा मान ।१। चलहि लहर अब बोट के, राज मं जोर दार। सुकमा ले कोरिया, कस के ठप्पा मार।२। पांच बछर के पाछु मं, मउका आइस फेर। खींच तान के संग मं, लोभ के लगहि ढ़ेर।३। गरिभा रहे कि गौटियां, सब्बो ऑफर पांय। अनपढ़ घलो पढ़े लिखे, ऑफर ना ठुकरांय।४। पांचों बछर बिकास बर, जोन जोन नरियांय। दु गुरिया नि पाहिं कका, त बोट देय नि जांय।५। माया अपरंपार हे, माया जाल चुनाव। बांचे...